महिला कांस्टेबल पर एसिड अटैक मामले में दोषियों को 14 वर्ष कैद की सजा

महिला कांस्टेबल पर एसिड अटैक मामले में दोषियों को 14 वर्ष कैद की सजा

मथुरा (ACID ATTACK)। उत्तर प्रदेश की मथुरा जनपद में तेजाब हमले के मामलों को देखने वाली फास्ट ट्रैक अदालत ने एक महिला कांस्टेबल पर तेजाब फेंकने के मामले में चार युवकों को 14-14 साल के कठोर कारावास तथा पचास-पचास हजार जुर्माने की सजा सुनाई है। अदालत ने पांचवें आरोपी को निर्दोष मानते हुए बरी कर दिया है जबकि इसी मामले में वारदात के समय एक आरोपी के नाबालिग पाए जाने पर उसका मामला किशोर न्याय अदालत में चलाया जा रहा है।

सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता भगत सिंह आर्य ने बताया कि मामला थाना सदर बाजार के दामोदरपुरा क्षेत्र का है। चार अप्रैल 2019 को सुबह चार बजे ड्यूटी पर जाने के लिए निकली बुलंदशहर की मूल निवासी महिला सिपाही पर खुर्जा के बिजलीघर क्षेत्र निवासी संजय उर्फ बिट्टू ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर तेजाब फेंक दिया था।

उन्होंने बताया कि इस मामले में पीड़िता ने संजय के अलावा सोनू, बॉबी, किशन, पुनीत और एक अन्य के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। संजय महिला पर लंबे समय से शादी के लिए दबाव डाल रहा था। आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ मथुरा के एसिड अटैक मामलों के लिए स्थापित की गई फास्ट ट्रैक कोर्ट (प्रथम) में आरोप पत्र दाखिल किया गया। एक नाबालिग आरोपी का मामला जुवेनाइल कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया।

आर्य ने बताया, ‘‘अदालत ने दोनों पक्षों की सुनवाई एवं उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संजय, सोनू, बॉबी और किशन को दोषी करार देते हुए सोमवार को 14-14 वर्ष के कठोर कारावास तथा 50-50 हजार रुपए के अर्थदण्ड की सजा सुनाई।’’


गंगा स्वच्छता का ये हाल! आचमन तो छोड़िए नहाने लायक भी नहीं है गंगाजल

गंगा स्वच्छता का ये हाल! आचमन तो छोड़िए नहाने लायक भी नहीं है गंगाजल

वाराणसी: गंगा स्वच्छता न सिर्फ बीजेपी सरकार बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना है। केंद्र की मौजूदा सरकार गंगा सफाई को लेकर किस कदर गंभीर है, इसका पता इस बात से चलता है कि सरकार ने गंगा के लिए एक अलग विभाग ही बना दिया। साल 2014 से लेकर अब तक नमामि गंगे प्रोजेक्ट के ऊपर करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं। लेकिन सवाल ये उठता है कि पतित पावनी का पानी कितना निर्मल हुआ ? क्या गंगा का पानी स्वच्छता के मानक के करीब पहुंच चुका है ? इन सवालों का जवाब है नहीं !

आरटीआई से हुआ बड़ा खुलासा
बनारस के रहने वाले समाजसेवी और क्रांति फाउंडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल कुमार सिंह ने गंगा सफाई को लेकर एक आरटीआई दाखिल किया था। आरटीआई से मिली जानकारी हैरान करने वाली है। जानकारी के अनुसार 90 में से 73 जगहों पर गंगा का पानी तय मानकों से कहीं ज्यादा प्रदूषित है। गंगा सफाई पर नेशनल मिशन फार क्लीन गंगा के अंतर्गत 2014 से अभी तक 9259.92 करोड़ रुपये खर्च कर दिये गये हैं, लेकिन गंगा की स्थिति मे कोई सुधार नहीं आया है।

इसमें उत्तर प्रदेश मे सबसे ज्यादा 2628.73 करोड़ रुपये, बिहार मे 2490.98 करोड़ रुपये तथा पश्चिम बंगाल मे 926.40 करोड़ रुपये गंगा सफाई पर खर्च कर दिये गये। राहुल कुमार सिंह के अनुसार गंगा सफाई पर इतने रूपये खर्च करने के बावजूद गंगा के रास्ते मे स्थापित 90 मानिटरिंग केंद्रों मे 73 स्थानों पर गंगा का पानी तय मानकों से कहीं ज्यादा प्रदूषित है।

आचमन तो छोड़िए नहाने लायक भी नहीं है गंगाजल
गंगा के पानी के प्रदूषण की जांच हेतु लाईव मानिटरिंग करने के लिए बनायी गयी वेबसाईट पर कोई भी व्यक्ति 125.19.52.219/wqi लिंक पर जाकर देख सकता है कि गंगा के पानी मे विभिन्न मानिटरिंग केंद्रों पर गंगा के पानी मे प्रदूषण की स्थिति कैसी है। राहुल कुमार सिंह के अनुसार लाईव मानिटरिंग वेबसाईट के अनुसार गंगोत्री से निकलने के पश्चात हरिद्वार के बाद गंगा मे प्रदूषण की स्थिति बेहद गंभीर होती चली गयी है।

अगर कालीफार्म की स्थिति की बात की जाये तो भारत सरकार के तय मानकों के अनुसार पीने के पानी मे कालीफार्म की संख्या 50 एमपीएन प्रति 100 मिली से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा नहाने के लिए अधिकतम कालीफार्म 500 एमपीएन प्रति 100 मिली निर्धारित है। पीने के पानी मे अधिकतम कालीफार्म 5000 एमपीएन प्रति 100 मिली हो तो शुद्धिकरण करने के पश्चात पानी को पीया जा सकता है।

 घुली हुई आक्सीजन की मात्रा मानकों के अनुरूप नहीं
अब अगर गंगा के पानी पर नजर डाली जाये तो उत्तर प्रदेश के कानपुर के शुक्लागंज मे कालीफार्म 26000, मिर्जापुर मे 23000, वाराणसी मे 17000, गोलाघाट गाजीपुर मे 22000, सारण मे 92000, पटना मे 92000, भागलपुर मे 160000 तथा पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद मे 23000 तथा हावड़ा मे बढ़कर 170000 एमपीएन प्रति 100 मिली हो गयी है जो कि तय मानकों से कहीं ज्यादा है। इनमे से ज्यादातर केंद्रों पर घुली हुई आक्सीजन की मात्रा तथा बी ओ डी(बायोकेमिकल आक्सीजन डिमांड) की मात्रा भी तय मानकों के अनुरूप नहीं है।


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