झारखंड में अब Covid19 की RT पीसीआर जाँच के लिए करना होगा केवल इतने रूपए खर्च, जाने

झारखंड में अब Covid19 की RT पीसीआर जाँच के लिए करना होगा केवल इतने रूपए खर्च, जाने

 दिल्ली और अन्य राज्यों में कोविड-19 (covid19) संक्रमण की जाँच के लिए पहले से निर्धारित दर को और कम कर दिया है, ताकि अधिक से अधिक लोग कोविड 19 की जाँच करा सकें

 अब झारखंड में भी कोविड-19 टेस्ट की दर कम कर दी गई है सरकारी हॉस्पिटल ों में जहां covid19 का सभी तरह का जाँच निशुल्क किया जाता है वहीं निजी पैथ प्रयोगशाला के लिए भी जाँच दर सभी कर के साथ निर्धारित कर दिया गया है अब झारखंड में Covid19 की RT पीसीआर जाँच के लिए सभी कर के साथ केवल 800 रुपये लगेंगे

स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव डॉ नितिन मदन कुलकर्णी ने कोविड-19 जाँच के संशोधित दरें जारी की जिसके मुताबिक निम्नलिखित दर तय किया गया है

कोविड जाँच विधि- दर
RT-PCR-- ₹800 ( सभी कर के साथ)
RAPID ANTIGEN-- ₹150  ( सभी कर के साथ)
TRU NAT TEST-- ₹1100 ( सभी कर के साथ)
CB NAAT - ₹2200 ( सभी कर के साथ)
IgG Based elisa test- ₹250 ( सभी कर के साथ)

ज्यादा रेट वलूसने पर होगी कार्रवाई

स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव के हस्ताक्षर से जारी पत्र में साफ शब्दों में हिदायत दी गयी है कि निर्धारित दर से अधिक कोई भी पैथलैब लेते पाए गए तो एपिडेमिक डिजीज कंट्रोल रेगुलेशन 2020 के प्रावधान के मुताबिक दंडित किया जाएगा

पहले RT पीसीआर के लिए  निर्धारित था 1050 रुपए

झारखंड में मार्च 2020 में जब कोविड-19 ने दस्तक दी थी तब सरकार ने निजी पैथोलॉजी प्रयोगशाला से  कोविड-19 जाँच के लिए ₹4500 की दर निर्धारित की थी जो समय के साथ साथ कम होता गया वर्तमान में 1050 रूपये लिए जा रहे थे


गंगा स्वच्छता का ये हाल! आचमन तो छोड़िए नहाने लायक भी नहीं है गंगाजल

गंगा स्वच्छता का ये हाल! आचमन तो छोड़िए नहाने लायक भी नहीं है गंगाजल

वाराणसी: गंगा स्वच्छता न सिर्फ बीजेपी सरकार बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना है। केंद्र की मौजूदा सरकार गंगा सफाई को लेकर किस कदर गंभीर है, इसका पता इस बात से चलता है कि सरकार ने गंगा के लिए एक अलग विभाग ही बना दिया। साल 2014 से लेकर अब तक नमामि गंगे प्रोजेक्ट के ऊपर करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं। लेकिन सवाल ये उठता है कि पतित पावनी का पानी कितना निर्मल हुआ ? क्या गंगा का पानी स्वच्छता के मानक के करीब पहुंच चुका है ? इन सवालों का जवाब है नहीं !

आरटीआई से हुआ बड़ा खुलासा
बनारस के रहने वाले समाजसेवी और क्रांति फाउंडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल कुमार सिंह ने गंगा सफाई को लेकर एक आरटीआई दाखिल किया था। आरटीआई से मिली जानकारी हैरान करने वाली है। जानकारी के अनुसार 90 में से 73 जगहों पर गंगा का पानी तय मानकों से कहीं ज्यादा प्रदूषित है। गंगा सफाई पर नेशनल मिशन फार क्लीन गंगा के अंतर्गत 2014 से अभी तक 9259.92 करोड़ रुपये खर्च कर दिये गये हैं, लेकिन गंगा की स्थिति मे कोई सुधार नहीं आया है।

इसमें उत्तर प्रदेश मे सबसे ज्यादा 2628.73 करोड़ रुपये, बिहार मे 2490.98 करोड़ रुपये तथा पश्चिम बंगाल मे 926.40 करोड़ रुपये गंगा सफाई पर खर्च कर दिये गये। राहुल कुमार सिंह के अनुसार गंगा सफाई पर इतने रूपये खर्च करने के बावजूद गंगा के रास्ते मे स्थापित 90 मानिटरिंग केंद्रों मे 73 स्थानों पर गंगा का पानी तय मानकों से कहीं ज्यादा प्रदूषित है।

आचमन तो छोड़िए नहाने लायक भी नहीं है गंगाजल
गंगा के पानी के प्रदूषण की जांच हेतु लाईव मानिटरिंग करने के लिए बनायी गयी वेबसाईट पर कोई भी व्यक्ति 125.19.52.219/wqi लिंक पर जाकर देख सकता है कि गंगा के पानी मे विभिन्न मानिटरिंग केंद्रों पर गंगा के पानी मे प्रदूषण की स्थिति कैसी है। राहुल कुमार सिंह के अनुसार लाईव मानिटरिंग वेबसाईट के अनुसार गंगोत्री से निकलने के पश्चात हरिद्वार के बाद गंगा मे प्रदूषण की स्थिति बेहद गंभीर होती चली गयी है।

अगर कालीफार्म की स्थिति की बात की जाये तो भारत सरकार के तय मानकों के अनुसार पीने के पानी मे कालीफार्म की संख्या 50 एमपीएन प्रति 100 मिली से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा नहाने के लिए अधिकतम कालीफार्म 500 एमपीएन प्रति 100 मिली निर्धारित है। पीने के पानी मे अधिकतम कालीफार्म 5000 एमपीएन प्रति 100 मिली हो तो शुद्धिकरण करने के पश्चात पानी को पीया जा सकता है।

 घुली हुई आक्सीजन की मात्रा मानकों के अनुरूप नहीं
अब अगर गंगा के पानी पर नजर डाली जाये तो उत्तर प्रदेश के कानपुर के शुक्लागंज मे कालीफार्म 26000, मिर्जापुर मे 23000, वाराणसी मे 17000, गोलाघाट गाजीपुर मे 22000, सारण मे 92000, पटना मे 92000, भागलपुर मे 160000 तथा पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद मे 23000 तथा हावड़ा मे बढ़कर 170000 एमपीएन प्रति 100 मिली हो गयी है जो कि तय मानकों से कहीं ज्यादा है। इनमे से ज्यादातर केंद्रों पर घुली हुई आक्सीजन की मात्रा तथा बी ओ डी(बायोकेमिकल आक्सीजन डिमांड) की मात्रा भी तय मानकों के अनुरूप नहीं है।


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