बच्चों और युवाओं में आनलाइन गेम की बढ़ती लत और उसके दुष्प्रभाव

बच्चों और युवाओं में आनलाइन गेम की बढ़ती लत और उसके दुष्प्रभाव

आजकल बच्चे अपना अधिकांश समय किसी न किसी डिजिटल माध्यम पर ही व्यतीत करते हैं। दरअसल पिछले करीब डेढ़ वर्षो तक बच्चों की पढ़ाई-लिखाई डिजिटल माध्यम से होने के कारण वे उनके जीवन का हिस्सा बन गए। ऐसे में उनका रुझान आनलाइन गेमिंग की ओर भी बढ़ता गया। हमारे मासूम इसके शिकंजे में आते गए। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि आनलाइन पढ़ाई के बाद ही बच्चे इसके शिकंजे में आए, लेकिन इसके बाद इस तरह के बच्चों की संख्या बेतहाशा बढ़ गई।

अधिकांश राज्य सरकारें अब तक इस समस्या के प्रति लापरवाह ही रही हैं, लेकिन कर्नाटक समेत कुछ अन्य राज्यों ने इस बारे में कठोर निर्णय लेते हुए इस पर पाबंदी लगा दी है। इसे वाकई में एक सराहनीय फैसला कहा जा सकता है। खासकर जिस राज्य में आइटी हब हो, वह इस तरह का साहस करे, तो आश्चर्य तो होता ही है, पर खुशी भी मिलती है। उसे चिंता है अपने राज्य के मासूमों की, उनके भविष्य की। उसे यह पता है कि इससे राज्य की आय पर बहुत अधिक फर्क पड़ेगा, फिर भी उसने यह हिम्मत दिखाई, जिसे सराहा जाना चाहिए।

इस समय हमारे देश में आनलाइन गेमिंग का धंधा करीब एक अरब डालर तक पहुंच चुका है। वर्ष 2016 में यह 4.3 करोड़ डालर का था। दरअसल आनलाइन गेमिंग एक ऐसा नशा है, जिसमें जो उलझ गया, वह अपना सबकुछ बरबाद कर देता है। एक तरह से यह जुआ ही है, जिस पर हमारे देश में कोई पाबंदी नहीं है। इसलिए यह बेखौफ चल रहा है। कर्नाटक सरकार ने आनलाइन गेमिंग पर प्रतिबंध लगाकर जो हिम्मत दिखाई है, उससे अन्य राज्यों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए।

पहले लोग वीडियो गेम्स खेलते थे, अब आनलाइन गेम्स के पीछे पागल हैं। भारत की गेमिंग इंडस्ट्री पर विदेशी निवेशकों के करोड़ों डालर लगे हैं। कर्नाटक सरकार के इस फैसले के खिलाफ आनलाइन गेमिंग से जुड़े लोग अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं, क्योंकि इससे उनकी करोड़ों की कमाई को झटका लगा है। कर्नाटक सरकार ने आनलाइन गेम खेलने वालों को मोबाइल में भेजे गए संदेश के माध्यम से यह बता दिया है कि अब आप इस राज्य में आनलाइन गेम नहीं खेल सकते। यह एक जुए जैसी प्रवृत्ति है।

अब तक कर्नाटक में जो आनलाइन गेम चल रहे थे, उसमें कई बड़े निवेशकों ने अपना धन लगाया हुआ था। इस पर प्रतिबंध लगाने वाला कर्नाटक पहला राज्य नहीं है। इसके पहले तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी इस पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। बहुत जल्द तमिलनाडु भी यही करने जा रहा है। पूवरेत्तर के भी कुछ राज्य भी इस पर पाबंदी लगा सकते हैं। कर्नाटक का फैसला इसलिए विवादास्पद हो गया है कि बेंगलुरु एक प्रकार से भारत की टेक्नोलाजी कैपिटल है। यहां विश्व की कई कंपनियों के कार्यालय हैं। कर्नाटक आइटी कंपनियों का हब बन गया है। आइटी और स्टार्टअप का क्षेत्र में भारतीय निवेशकों के लिए मुनाफा देने वाला महानगर बन गया है। इस स्थिति में कर्नाटक ने आनलाइन गेमिंग पर प्रतिबंध लगाकर विश्व के गेमिंग क्षेत्र में एक विवाद उत्पन्न कर दिया है।

इसी साल अगस्त में चीन में भी इस तरह का एक विधेयक पारित किया गया था। इस विधेयक के अनुसार बच्चे एक सप्ताह में तीन बार तीन घंटे तक वीडियो गेम खेल सकते हैं। वर्ष 2011 में दक्षिण कोरिया ने भी शटडाउन कानून घोषित किया था, जिसके अनुसार 16 वर्ष तक के किशोर वीडियो गेम्स खेल सकते हैं। जापान के कांसी प्रांत में तो नाबालिगों के लिए बाकायदा गेम का समय तय किया गया था। इस फैसले से दो गेमिंग कंपनी टेंसेट और लेट्स के शेयर्स 11 प्रतिशत तक टूट गए थे।

वैसे यह भी सच है कि इन कानूनों पर पूर्णतया अमल नहीं हो पाता है। चीन तो कानून का उल्लंघन करने वाली कंपनी को बंद करवा सकता है, परंतु दक्षिण कोरिया ने अपना शटडाउन कानून वापस ले लिया। जब तक हम नैतिक रूप से आनलाइन गेमिंग से दूर रहने का संकल्प नहीं ले लेते, तब तक इन प्रतिबंधों का कोई असर नहीं होगा। नई पीढ़ी आऊटडोर गेम से दूर होती जा रही है। इस कारण उनका शरीर भी कमजोर पड़ता जा रहा है। यह पीढ़ी आने वाले संघर्षो में अपना ही साथ नहीं दे पाएगी। इन्हें रास्ता बताने का काम वर्तमान पीढ़ी का है। आनलाइन गेम खेलने वाले बच्चे और युवा चिड़चिड़े स्वभाव के होने लगे हैं। खुले मैदान में खेले जाने वाले खेल इनके लिए एक सपने की तरह हो गए हैं।

ऐसे में दक्षिण के राज्य सचेत होकर इस पर प्रतिबंध लगा रहे हैं, परंतु महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्य जहां आनलाइन गेम की तूती बोलती है, आखिर वे क्यों बेबस हैं? इन राज्यों में आनलाइन गेम वाले करोड़ों कमा रहे हैं। आखिर इन राज्यों की आंखें क्यों नहीं खुलतीं? महत्वपूर्ण यह भी है कि क्या इंटरनेट पर किसी साइट पर लगाया गया प्रतिबंध लंबे समय तक चल पाया है? आज भी कई प्रतिबंधित साइट्स को लोग बदले हुए नामों के साथ देख सकते हैं। जरूरत है कि आनलाइन गेम के खिलाफ हम एकजुट होकर इसका विरोध करें, ताकि हमारे बच्चे और युवा दिग्भ्रमित न हों, उन्हें एक सही रास्ता दिखाया जाए। वह अपना कीमती समय और धन बचा सकें। इसके लिए हमें आगे आना ही होगा।


क्या बिना मर्जी लगाया जा सकता है कोरोना का टीका? सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिया जवाब

क्या बिना मर्जी लगाया जा सकता है कोरोना का टीका? सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिया जवाब

नई दिल्ली: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी कोविड-19 टीकाकरण दिशानिर्देशों में किसी व्यक्ति की सहमति के बिना उसका जबरन टीकाकरण कराने की बात नहीं की गई है। दिव्यांगजनों को टीकाकरण प्रमाणपत्र दिखाने से छूट देने के मामले पर केंद्र ने न्यायालय से कहा कि उसने ऐसी कोई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी नहीं की है, जो किसी मकसद के लिए टीकाकरण प्रमाणपत्र साथ रखने को अनिवार्य बनाती हो।

केंद्र ने गैर सरकारी संगठन एवारा फाउंडेशन की एक याचिका के जवाब में दायर अपने हलफनामे में यह बात कही। याचिका में घर-घर जाकर प्राथमिकता के आधार पर दिव्यांगजनों का टीकाकरण किए जाने का अनुरोध किया गया है। हलफनामे में कहा गया है कि भारत सरकार और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी दिशानिर्देश संबंधित व्यक्ति की सहमति प्राप्त किए बिना जबरन टीकाकरण की बात नहीं कहते। केंद्र ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की मर्जी के बिना उसका टीकाकरण नहीं किया जा सकता।