रामविलास पासवान ने एक अनौपचारिक भोज के दौरान उल्टा विचारधारा वाली पार्टियों के साथ किए थे यह सवाल, जानिए

रामविलास पासवान ने एक अनौपचारिक भोज के दौरान उल्टा विचारधारा वाली पार्टियों के साथ किए थे यह सवाल, जानिए

राजनीति में आप जिसका साथ दे रहे हैं, वह आपको भुला सकता है, लेकिन अगर आप किसी समूह पर हमला बोल दें तो वे ना कभी भूलेंगे व नाहीं कभी माफ करेंगे रामविलास पासवान ने एक अनौपचारिक भोज के दौरान विभिन्न व उल्टा विचारधारा वाली पार्टियों के साथ उनके मधुर संबंधों के राज के बारे में सवाल करने पर कुछ ऐसा बोला था.

 पासवान की सियासी विचाराधारा का यह मूल देश के जरूरी दलित नेता के व्यक्तित्व को दर्शाता है, जो खुद कभी किंग (प्रधानमंत्री) नहीं बन सके लेकिन अपने पांच दशक से भी लंबे करियर में उन्होंने तमाम लोगों को शीर्ष की कुर्सी पर बैठाया व उन्हें उतरते हुए भी देखा.

लोकप्रिय दलित नेता का दिल्ली के एक अस्पताल में बृहस्पतिवार की शाम 74 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गया. हाल ही में उनके दिल का ऑपरेशन हुआ था. पासवान हमेशा से दोस्त बनाने, संबंधों में निवेश करने में भरोसा रखते थे व कभी-कभी खुद को झगड़ रहे गठबंधन सहयोगियों के बीच संबंधों को मजबूत बनाने वाले की तरह भी देखते थे. पुलिस की जॉब छोड़कर पॉलिटिक्स में कूदे पासवान 1969 में कांग्रेस-विरोधी मोर्चा की ओर से चुनाव मैदान में उतरे व पहली बार विधायक निर्वाचित हुए. जमीन से आरंभ तक कई समाजवादी पार्टियों में विभिन्न पदों पर रहते हुए, समय के साथ-साथ बदलते उनके स्वरूप के साथ देश के जरूरी दलित नेता बनकर ऊभरे.

बिहार के खगड़िया में 1946 में जन्मे पासवान आठ बार निर्वाचित होकर लोकसभा पहुंचे व वैसे वह राज्यसभा के मेम्बर थे. चौधरी चरण सिंह नीत लोक दल में बरसों तक पासवान के साथ रहे जद(यू) के के। सी। त्यागी उन्हें 45 वर्ष से भी लंबे वक्त तक का समाजवादी कर्मी बताते हैं. उनका बोलना है कि लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के निर्माणकर्ता ने उत्तरी हिंदुस्तान में दलितों को एकजुट करने का जरूरी कार्य किया व जाते-जाते भी उनकी आवाज बने रहे.

पासवान के मृत्यु के साथ ही 1975-77 में लगाए गए आपातकाल के विरोध में हुए जनआंदोलन के जरूरी समाजवादी नेता की ज़िंदगी लीला का पटाक्षेप हो गया. वह कई बार बड़े प्रेम से ऐसी कविताएं सुनाया करते थे जिनमें सियासी व सामाजिक संदेश रहता था, कई उनकी खुद की लिखी होती थीं.

पासवान 1989 में सत्ता में आयी वी। पी। सिंह सरकार में जरूरी विभाग के मंत्री रहे व अन्य पिछड़ा वर्ग के रिज़र्वेशन से जुड़े मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कराने में जरूरी किरदार निभाई, जिसमें बिहार व यूपी जैसे हिन्दी भाषी राज्यों में सियासी समीकरण को हमेशा के लिए उलट-पलट दिया.

पासवान के व्यक्तित्व में विशेष आकर्षण यह भी था कि पार्टी व गठबंधन चाहे किसी भी विचारधारा के हों, उनके संबंध सभी के साथ हमेशा मधुर रहे हैं. आलम यह रहा कि कांग्रेस पार्टी विरोधी आंदोलन से सियासी करियर प्रारम्भ करने वाले पासवान की अटल बिहारी वाजपेयी व सोनिया गांधी दोनों से छनती थी. वह वाजपेयी नीत राजग सरकार में मंत्री रहे तो मनमोहन सिंह नीत संप्रग सरकार में भी मंत्रिमंडल के मेम्बर रहे व पीएम नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में 2014 से लेकर अभी तक वह केन्द्रीय मंत्रिमंडल का जरूरी भाग रहे.

दिलचस्प बात यह भी है कि भगवा पार्टी के साथ मतभेद बढ़ने पर वह वाजपेयी सरकार से अलग हुए थे, उस दौरान गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी की ओलाचना में उन्होंने कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी थी, लेकिन मई, 2014 में मोदी के नेतृत्व में राजग की सरकार में शामिल होने के बाद वह पीएम के विश्वासपात्र बन गए, खास तौर से दलित मुद्दों पर. अपने सियासी करियर के शुरुआती दो दशकों में पासवान राष्ट्रीय खुद सेवक संघ के कटु आलोचक हुआ करते थे. लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने नरम रूख अपना लिया व हमेशा कहते रहे कि हिन्दुत्व संगठन को दलितों के लिए अपनी छवि बदलने की जरुरत है.

वह दलितों के हित में पीएम मोदी द्वारा किए गए कार्यों का खूब समर्थन करते थे व इस मामले पर सरकार की आलोचना करने वालों को आड़े हाथों लेते थे. केंद्र में सत्ता में आने वाले गठबंधन के साथ पानी में नमक की तरह घुलमिल जाने की प्रवृत्ति के कारण कई बार आलोचक उन्हें ''मौसम वैज्ञानिक भी बुलाते थे.