लीची का सेवन करने से हो रही है ये गंभीर बीमारी, 108 बच्चों के गवाई जान

लीची का सेवन करने से हो रही है ये गंभीर बीमारी,  108 बच्चों के गवाई जान

चमकी बुखार का कहर जारी है। पिछले एक सप्ताह में अब तक 108 बच्चों के जान गंवाने की खबरें आ चुकी हैं। पिछले दो दशकों में AES की वजह से देश में 5000 से अधिक बच्चों की मृत्यु हो चुकी है।

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इस रोग में बच्चे का शरीर तपने लगता है, जिसकी वजह से उसके शरीर में कंपन व झटके लगते रहते हैं। शरीर में बार-बार लगने वाले इन झटकों की वजह से इसे क्षेत्रीय बोली में 'चमकी बुखार' बोला जाता है।

मुजफ्फरपुर में AES यानी चमकी बुखार के कहर के बीच न्यूरोलॉजिकल बीमारी के संदर्भ में हुए एक शोध में खुलासा हुआ है कि इस रोग का प्रमुख कारण लीची का सेवन करना है। द लेनसेट ग्लोबल हेल्थ मेडिकल जनरल में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, इंस्लोपैथी यानी दिमागी बुखार के फैलने में लीची ज़िम्मेदार होती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, इस बीमारी की चपेट में आए इलाकों में जिन बच्चों ने रात का खाना स्किप किया है व लीची ज्यादा खा ली हो, उनके हाइपोग्लैसीमिया के शिकार होने का खतरा ज्यादा हो जाता है।

लेकिन क्या लीची वाकई इतना खतरनाक फल है? नहीं, अस्ल में, बिहार में AES का कारण मानी जा रही लीची के फायदे बहुत हैं, लेकिन बिहार में जो बच्चे इसका सेवन करने से बीमारी के शिकार हुए, उनमें कुपोषण के लक्षण देखे गए। एक्सपर्ट्स के मुताबिक जिन बच्चों ने लीची खाने के बाद पानी कम पिया या बहुत ज्यादा देर तक पानी पिया ही नहीं, उनके शरीर में सोडियम की मात्रा कम हो गई, जिसके चलते वो दिमागी बुखार के शिकार हो गए।

लीची में कुदरती तौर पर है विषैला तत्व!
छह वर्ष पहले ​राज्य सरकार ने दो सदस्यीय एक टीम को लीची में कुदरती तौर पर उपस्थित एक किस्म के ज़हर के बारे में शोध के लिए बुलाया था। इस विषैले तत्व का नाम methylenecyclopropylglycine यानी मिथाइलीनसाइक्लोप्रॉपिलग्लाइसीन (MCPG) है, जिसे सरल भाषा में हाइपोग्लाइसीन ए (hypoglycin A) के नाम से जाना जाता है।2017 में, एक भारतीय अमेरिकी टीम ने इसकी पुष्टि भी की। दो सदस्यीय टीम ने यह भी देखा कि लीची खाने से वो बच्चे अगली प्रातः काल बीमारी के शिकार हुए, जो कुपोषण से ग्रस्त थे व लीची खाने के बाद खाली पेट ही सो गए थे।


इस वर्ष लीची कैसे हुई खतरनाक?
वर्ष 2014 में, इसी टीम ने इस बीमारी के शिकार 74 प्रतिशत बच्चों को एक सरल ढंग से बचाने में भी मदद की थी। AES बीमारी के लक्षण दिखने के चार घंटों के भीतर ही पीड़ित बच्चों की नसों के ज़रिए 10 प्रतिशत डेक्स्ट्रोज़ का डोज़ दिया गया, जिससे रोकथाम संभव हो सकी। इसके बाद बचाव के मकसद ये सिफारिश जारी की गई कि इस बात का प्रचार किया जाए कि बच्चे भूखे पेट न सोएं।

इस सिफारिश के बाद अभियान के तौर पर प्रभावित इलाके में रोकथाम संबंधी ये प्रचार किया गया। इसका प्रभाव ये हुआ कि वर्ष 2015 में इस बीमारी के पीड़ितों में बहुत ज्यादा कमी देखी गई थी। द हिंदू की एक रिपोर्ट में इस विश्लेषण के हवाले से बोला गया है कि इस वर्ष दशा ये रहे कि प्रदेश व प्रशासन बचाव के लिए ये जागरूकता फैला पाने में नाकाम रहा। यहां तक कि, कुछ डॉक्टरों ने इस बीमारी के फैलने के बारे में व भी कारणों की चर्चा की व ये थ्योरी बेहद भ्रामक थी कि 'हीट वेव' से ये बीमारी फैलती है।

आखिर में लीची के फायदे जानें
- लीची में विटामिन सी एंटिऑक्सीडेंट होते हैं, जो तनाव कम करने व आर्थराइटिस जैसे रोगोंं से बचाने में सहायक हैं।
- लीची में विटामिन बी कॉम्प्लेक्स होता है। लीची अस्थमा से बचाने में असरदार है।
- खून के उत्पादन में सहायक पोषक तत्वों से भरपूर लीची में मैंगनीज़, मैग्नीशियत, तांबा, आयरन जैसे खनिज होते हैं जो ब्लड प्रेशर संतुलित रखते हैं।
- फाइबर व विटामिन बी कॉम्प्लेक्स के साथ ही पाचन में मददगार फैट, प्रोटीन व कार्बोहाइड्रेट भी लीची में होते हैं।
- जल्दी बुढ़ापे की निशानियों से बचाने में लीची मददगार है।
- लीची में पौटेशियम होता है जो शरीर में सोडियम व द्रव के लेवल दुरुस्त रखने में मददगार है। इससे हाई ब्लड प्रेशर व दिल के भ्रमण के खतरा कम होता है।
- लीची लाभकारी है, लेकिन इसे खाली पेट न खाएं या इसे खाने के बाद ज़्यादा देर भूखे प्यासे न रहें व भूखे पेट न सोएं।